(1)
भर्री भाँठा खेत, सबो परिया पर जाही।
छत्तीसगढ़ मा देख, मानसुन जे नइ आही।
मरजाही सब पेंड़, घाँस मन तको सुखाही।
जीव सबो मरजाय, बता फिर कोन बँचाही।।
(2)
मनखे जावव चेत, पेंड़ ला अभी लगालव।
बोर करव सब बंद, कुँआ तरिया अपनालव।
नदिया देवव बाँध, नहर ला अउ बगरालव।
हरियर हरियर खेत, खुसी ला सबझन पालव।।
(3)
लहराही जब पेंड़, खुसी के बादर छाही।
गरजत घुमड़त आय, पोठ के जल बरसाही।
हरसाही सब जीव, बने सब भोजन पाही।
तब ही मनखे तोर, मेहनत हा रँग लाही।।
छंदकार - दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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