Wednesday, 2 October 2019

चौपई छंद

नशा

नशा नाश करथे ये जान,तन हो जाते मरे समान।
झन रहिबे तँय हर अनजान,नुकसानी ला अब पहिचान।

सब्जी के बड़ बाढ़े भाव,चटनी ले अब काम चलाव।
बोरे बासी सबझन खाव, दार भात ला दूर हटाव।

चिखला के अब दिन हर आय,देख पाँव हर फिसलत जाय।
नोनी मटक मटक इतराय,भद ले गिरगे सबो सनाय।

येती सुख्खा ओती बाढ़, हवा चले ले ठिठुरे हाड़।
पेंड़ सूख गे देखव ठाड़,धूंका मा बड़ लागय जाड़।

लइका कूद कूद इतराय,बरसा ले ओ नइ घबराय।
बाहिर कोती नाचत जाय, बरसा के ओ मजा उड़ाय।

गरजत हे बाहिर झन जाव, बिजुरी ले थोरिक डर्राव।
घर मा बइठे जान बचाव,नइ ते बिजुरी तन मा खाव।

करिया बादर जब जब आय,रद रद रद पानी बरसाय।
सब किसान के मन हरसाय,बाढ़ आय ले सब पछताय। 

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