Sunday, 30 May 2021

कुण्डलियाँ

कुण्डलियाँ 

टुकना भर लाई धरे,गली गली बगरायँ। 
राम नाम हा सत्य हे, कहत सबो झन जायँ। 
कहत सबो झन जायँ,सजे सुग्घर हे डोली। 
काँधा धरे उठाय, रोय जम्मो हमजोली। 
जल्दी लेग जलाव,गलत होही अब रुकना।  
छीचव लाई लाव,भरे जे हावय टुकना।1। 

आवत खानी हाँस के,सब देथे पुचकार। 
मोह मया मा फाँस के,कर देथे लाचार। 
कर देथे लाचार,कहन कुछ नइ तो भावय। 
सुख दुख मा समटाय, मजा अबड़े जब पावय। 
मोह मया ला छोंड़,बड़ा दुख मिलथे जावत। 
काबर लेथे बाँध, मया ले जग मा आवत।2। 

बारव बारव सब कहे,जब तन होथे लास। 
जीयत ले स्वारथ जुड़े,मरे त नइ हे खास। 
मरे त नइ हे खास,देख कोनो नइ भावयँ। 
जावत ले बस रोय, तहाँ ले मजा उड़ावयँ। 
बास कहूँ झन आय,इहाँ ले जल्दी टारव। 
लकड़ी फाटा लान,तुरत आगी मा बारव।3। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

बाल कविता

साइकल कैंची फाँक

साइकल सीखत हे सोनू, 
सँग मा दउड़त हे मोनू। 

कैची फाँक फँसाये हे, 
हेंडिल सम्हल न पाये हे। 

हॉफ पायडिल मारत हे, 
झट ले पाँव उतारत हे। 

फिर खट ले चढ़ जावत हे, 
अड़बड़ मजा उड़ावत हे। 

जाने का मनवा जागिस, 
रेस चलाये बर लागिस।

गड्ढा पागे हकरस ले। 
सोनू गिर गे भकर ले।  

कुकुर 

मोर कुकुर के टेड़गा पूँछ।  
बबा ऐंठ राखे जस मूँछ। 

कतको सोज करँव नइ होय।  
काँय काँय रतिहा भर रोय।

भूँकत रहिथे वो दिन रात। 
निशदिन खावत रहिथें लात। 

कतको मार तभो नइ जाय। 
 जूठा पटरी चाँटय खाय।  

मोर कुकुर अब्बड़ हुशियार।
रतिहा जागय बन रखवार।  

वफादार मा अउवल ताय। 
मनखे तक ला धूल चटाय। 

इसकुल खुलगे आजा 

सुन रे सोनू सुन रे मोनू, 
इसकुल खुलगे आजा। 

कोरोना के काल सिरा गे, 
समाचार सुन ताजा। 

बिहना ले उठ कर ले झटपट, 
इसकुल के तैयारी। 

पुस्तक कॉपी कलम खोज तँय, 
झन जा ब्यारा बारी। 

नहा खोर के बासी खाले, 
बन जा भइया राजा। 

सुन रे सोनू सुन रे मोनू, 
इसकुल खुलगे आजा। 

गुड्डा गुड़िया छोड़ दुलौरी, 
अब तोला हे पढ़ना। 

निशदिन इसकुल आके बेटी, 
भाग अपन हे गढ़ना। 

बरतन धर के तरिया डबरी, 
माँजे बर अब ना जा। 

कोरोना के काल सिरागे, 
इसकुल खुलगे आजा।  

नावा चप्पल-दिलीप कुमार वर्मा

जरय भोंभरा चट चिट चइया।  
कइसे के जरही अब भइया।

मोर ददा सब दुख ला जाने।
नावा चप्पल ले के लाने। 

चट-चट चट-चट महूँ बजाहूँ। 
रेंगत जेन गली मा जाहूँ। 

धुर्रा माटी अब नइ होवय। 
काँटा खूंटी अब न गड़ोवय। 

गद्दी वाला चप्पल हावय। 
रंग चटक मोरो मन भावय। 

रोज-रोज येला मँय धोहूँ। 
मुरसरिया मा रख के सोहूँ। 

सयकिल दउड़-दिलीप कुमार वर्मा

सोनू मोनू सयकिल धर के। 
चन दिस हवय चलाये बर। 

दुन्नो झन तइयार खड़े हे। 
सरपट दउड़ लगाये बर। 

अंतस मन मा जोश भरे हे। 
सब ले अउवल आये बर। 

दउड़े लागिस सयकिल सरपट। 
ऊपर मा उड़ियाये बर। 

चलत-चलत गड्ढा हर आगे। 
भूले ब्रेक लगाये बर। 

सयकिल तक उड़िया के गिर गे। 
दुन्नो ला समझाये बर।  

बात समझ मा आगे सोनू
मोनू सीख चलाये बर।

जादा तेज चलाना होथे। 
हाथ पाँव तुड़वाये बर।

नावा कुरता 

नावा कुरता पहिरे सोनू। 
मुच-मुच-मुच मुस्कावत हे।

मुड़ी उठा के हीरो जइसे। 
खोर गली मा जावत हे।

जेला देखय बहुत लजावय। 
मुड़ी तहाँ गड़ियावत हे।

संगी साथी मन ले मिलके। 
सब झन ला दिखलावत हे।

नवा-नवा के मजा अलग हे।
एक तरफ तिरियावत हे। 

मइला जाही कुरता कहिके। 
खेले बर घबरावत हे।

गिनती

एक दो तीन चार। 
पढ़ना लिखना हावय सार। 

पाँच छय सात आठ। 
याद करव जी पूरा पाठ। 

नौ दस ग्यारा बारा। 
रहव नही कोनो बेचारा। 

तेरा चउदा पन्द्रा सोला। 
पढ़े लिखे सीखत हे भोला। 

सतरा अठरा उन्नीस बीस। 
पाठ सपाट सबो कर दीस। 

छन्न पकैया 

छन्न पकैया छन्न पकैया 
बबलू बंटी आवव। 
खेल-खेल मा का सीखे हव 
आके अभी बतावव। 

छन्न पकैया छन्न पकैया 
गिनती जोड़ घटाना। 
पढ़ना लिखना तको सिखेहन 
अँगरेजी बतियाना। 

छन्न पकैया छन्न पकैया 
सुग्घर करे पढ़ाई। 
होन हार लइका ला पा के 
मगन ददा अउ दाई। 

मुसुवा बने रखवार 

जोश-जोश मा मुसुवा इक दिन। 
बन बइठे सीमा रखवार। 

काँध रखे बंदूक पहुँच गे। 
जिहाँ बरफ के भारी मार। 

किट-किट किट-किट दाँत करे अउ। 
तन काँपे रुखुवा कस डार। 

बैरी ले टकराये पहिली। 
मुसुवा बपुरा माने हार। 

मुँह लटकाये वापिस आगे। 
ठंडा ला नइ पाइस झेल। 

सीमा के रखवारी करना। 
नोहय लइका मन के खेल। 

पुतरी के बिहा 

पुतरी बर लुगरा चल लाबो। 
बँह भर चूरी ला पहिराबो। 

पौडर टिकली माहुर काजर। 
ले के आबो आगर-आगर। 

करधन कंगन मुंदरी माला। 
नथली बिछिया पायल बाला। 

दुलहन कस पुतरी ल सजाबो।
पुतरा के सँग बिहा कराबो।  

बजही जम के गाजा बाजा। 
अब्बड़ मजा उड़ाबो आजा।

मोरो होही बिहा एक दिन। 
पर के घर मँय जाहूँ। 

बिना ददा दाई के संगी। 
मँय कइसे जी पाहूँ।  

चश्मा-दिलीप कुमार वर्मा 

बइठे रहिथे नाक मा
पकड़े रहिथे कान। 
चकचक ले उज्जर करे
बुढ़वा बर वरदान। 

घाम तको ला ढाँक दय
जइसे बदरी छाय। 
धुर्रा ला दुरिहा रखे
बहुत काम ये आय।  

हवा लगय नइ आँख मा
कीरा घुँस नइ पाय।  
टेढ़ा मेढ़ा रूप मा
चार चाँद लग जाय।

रंग-रंग के मिल जथे 
जेखर चश्मा नाम।  
ले लव हाट बजार मा 
सस्ता हावय दाम।

भोलू बंदर 

मँय बन जाहूँ भोलू बंदर। 
सब झन कइहीं मस्त कलंदर। 

रुखुवा मा चढ़ जाहूँ खट ले। 
आम टोर मँय खाहूँ फट ले। 

कूदत रइहूँ येती ओती। 
जाहूँ मँय मन करही जेती। 

बारी बखरी मा घुस जाहूँ। 
आनी बानी के फर खाहूँ। 

बरजे आही तब डरवाहूँ। 
खिसखिस कर के दाँत दिखाहूँ। 

लाठी धर कोनो जब आही। 
मोर पार कोनो नइ पाही।

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

कुंडलियाँ

कुंडलियाँ 

सुनी सुनाई बात पर, मत करना विश्वास।  
मन बोझिल होता बहुत, तन को करता नास। 
तन को करता नास, बिगाड़े रिस्ते नाते।  
शक रहता दिनरात, चैन तन फिर ना पाते। 
बात-बात पर द्वेष, लड़े फिर भाई-भाई। 
मत करना विश्वास, बात जो सुनी सुनाई।1।

नारद बन फिरते यहाँ, चुगली कर लड़वाय। 
छुप के देखे दूर से, बात समझ ना आय। 
बात समझ ना आय, मिले क्या इनको भाई।  
इधर उधर कर बात, कराते खूब लड़ाई। 
खुरा पात मन सोच, दिए क्यूँ इनको शारद। 
मिलते लोग अनेक, बसे जिनके मन नारद।2।

लालच करना पाप है, कहते हैं जो लोग। 
खुद लालच में हैं फँसे, करते वो उपभोग।  
करते वो उपभोग, छीन कर ले लेते हैं। 
कहते कर लो दान, कभी खुद कब देते हैं। 
इनका है उद्देश्य, तिजौरी अपनी भरना। 
शिक्षा देना काम, पाप है लालच करना।3।

ठोकर खा कर चेत ते, जो ना माने बात। 
वक्त दिखाता है सदा, क्या तेरी अवकात। 
क्या तेरी अवकात, बना अभिमानी फिरता। 
जो ऊपर को जाय, एक दिन वो ही गिरता। 
सफल हुए वो लोग, रहे अपनो में आकर। 
पर कुछ होते लोग, सीखते ठोकर खा कर।4। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

सवैया

सवैया 

गहरी-गहरी सब बात करैं उतरे गहरी अब कोन पढ़य।  
घबरावत बात सुने गहरी उथली-उथली तब भाव गढ़य।
कतको लिखथें गिरिराज हिमालय कोन बता फुलगी म चढ़य। 
उथली-उथली लिख राख सबे निपटा-निपटा अब राह बढ़य।

इतरावत हें मनखे जब फोकट के भर पेट मिले अन पानी। 
अब काम करे नइ जावत हें घर मा बइठे करथें मनमानी। 
उन घूमत खोर गली मिलथें बिन फोकट मारत जाय पुटानी। 
ठलहा रहि रोज नशा करथें तन घूरत जाय नही पहिचानी। 

घुघवा नित आवत हे घर मा नरियावत राहय बैठ अटारी। 
सुन के डर लागत रात खनी दिख पाय नही रतिहा बिट कारी। 
हमरो महतारिन जाग जवै अउ जोर लगा उन देवय गारी। 
सुन के घुघवा उड़िया वय जी मूसुवा पकड़े खुसरे झट बारी। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

सवैया

सवैया 

सोंचत हे मछरी तक काँपत का करके मँय रात बितावँव। 
बाढ़त हे अब जाड़ तको तरिया सँग मा कहुँ ना जम जावँव। 
मोर खुराक तको नइ हे अब खोज कहाँ मँय भूख मिटावँव।
शॉल मिले न मिले अँगरा कइसे करके अब जान बचावँव। 

बाहिर जा सकतेंव कहूँ ककरो कथरी रजिया म लुकातेंव। 
खाय तको मिलतीस तहाँ चुपके-चुपके तनियावत खातेंव। 
रोज नवा परिधान लपेट दिखावत लोगन ला इतरातेंव। 
जाड़ लगे अबड़ेच तहाँ अँगरा खुसरे मँय जान बचातेंव।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

घनाक्षरी

घनाक्षरी 

जनम-जनम बर, बँधना बँधाये हवे, 
तोर-मोर गड़ी सुन, शुभ सुरुवात हे।
जिनगी के रसता म, काँटा खूँटी मिल जाथे, 
टारत-टारत चल, तभे मजा आत हे
उरभट रसता म, सम्हल-सम्हल चल,  
देख के हपट झन, अँधियारी रात हे।
सुख दुख जिनगी के, घाम छाँव कस होथे, 
आवत जावत रथे, डरे के का बात हे।

झरर-झरर झर, झरना ले पानी गिरे, 
सादा-सादा दूध कस, झर-झर आत हे।  
जंगल के बीच रहे, झरना तीरथ गढ़, 
दूर-दूर के लोगन,देखे बर जात हे।  
कोनो देखे ऊपर ले, कोनो नीचे देखे जाय, 
आनी बानी पोज दे के, फोटो खिंचवात हे। 
निरमल पानी पाय, देख-देख हरसाय, 
डुबक-डुबक के जी, कतको नहात हे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

घनाक्षरी

जल हरण घनाक्षरी 

खटिया के चार खुरा, बिना पाटी के अधूरा, 
गाँथबे नेवार कामा, कर ले विचार तँय। 

कहूँ रखे चार पाटी, कतको रहे वो खाँटी, 
बिना खुरा पाबे कहाँ, सोंच ले अधार तँय। 

राख खुरा पाटी सँग, गाँथ ले नेवार तँग, 
सुत फिर लात तान, रोज थक हार तँय।

सुख जिनगी म पाबे,गंगा रोज तें नहाबे, 
नता रिसता ल जोंड़, जिनगी सँवार तँय।1।

मनहरण 

थोथना उतार झन, रेंगे बर हार झन, 
जेन रुक जावत हे, उही मरे जान ले। 

कोन राह अपनाही, कोन तोर सँग जाही, 
कोन हा छुडाही हाथ, बने पहिचान ले। 

रददा ये सरल नहीं, तभो ये गरल नहीं,
काँटा खूंटी ले भरे हे, बात सच मान ले। 

उही ह मंजिल पाथे, जेन म साहस आथे, 
चलना हे चलना हे, बस इही ठान ले।2।

दर्पण देख देख,सूरत सँवार डरे, 
अंग ला निखार डरे, मेंकब लगाई के।  

झक मिक झक दिखे, लोग एक टक देखे, 
मटक मटक चले, महफ़िल आई के। 

मुच मुच मुस्काय, आँखी तक मटकाय,
तनिक न सरमाय, तन ला दिखाई के। 

फेसन हे भरमार, मोला लगे अंधकार, 
जग चौंधियाय दिए, बिजुरी गिराई के।3।

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

कुंडलियाँ

कुंडलियाँ 

रसता मा कंक्रीट के, गिर गे बबा उतान। 
गोटानी तक टूट गे, होगे मरे बिहान। 
होगे मरे बिहान, बबा भारी खिसियावय। 
आये कइसन राज, गली मा धार बहावय। 
कहिथें होत विकास, देख हालत हे खसता।
बने रहिस वो गाँव, मुरुम के राहय रसता।1।

जाना हावय एक दिन, ये दुनिया ला छोड़। 
हपट हपट तँय रात दिन, धन दौलत झन जोड़। 
धन दौलत झन जोड़, काम थोरिक नइ आवय। 
नइ जावय ये संग, नही ये जान बचावय।  
जे दुनिया मा आय, सबो ला मिलथे खाना।
करबे काय बटोर, एक दिन जब हे जाना।2। 

हपटत बन खपरा मरे, पाई-पाई जोड़। 
टुरा उदाली मारथे, ददा गए सब छोड़। 
ददा गये सब छोड़, सोग पीरा नइ जानय। 
दारू मुर्गा रोज, कभू बरजे नइ मानय। 
संगी मन जुरियाय, खाय जम्मो झन झपटत।   
पाई पाई जोड़, ददा हर मरगे हपटत।3।

दुख हावय जस नौतपा, जिनगी झुलसत जाय। 
करँव अगोरा रात दिन, सावन हर कब आय। 
सावन हर कब आय, बुझा दय लगे अगन ला।
पानी अस बरसाय, बहा दय सबो तपन ला। 
तन मन सब हरियाय, सुखे सुख मन भर पावय। 
जिनगी ला झुलसाय, नौतपा कस दुख हावय।4।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

Thursday, 27 May 2021

गजल

गजल

2122  1122 1122  22

राम के नाम जपे ले सबो झन तर जाथें। 
मन तको शांत रहे राम के जे दर जाथें।  

जेन जन्मे नही अवतार ले जे हर भाई।
राम वो नाम जे हर काम हमर कर जाथें। 

माँ के दरबार सजे देख पहाड़ा वाली।
पूरा होथे रखे मन कामना जे हर जाथें।

आये सावन के महीना तहाँ शिव मंदिर मा।   
पाँव छाला परे तब ले धरे काँवर जाथें। 

नइ हे भगवान कहे ये सबो आडम्बर ये।
फेर घोंडत बता दरबार म काबर जाथें। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

गजल

12122  12122 12122  12122

कहाँ लुकागे हवस मयारू डगर निहारत समे निकल गे। 
बरात लाहूँ कहे रहे तँय  मुकुट सँवारत समे निकल गे। 

बनाय काली उहू भसक गे गिरे बरोबर तको न पानी। 
सुधार होही कहे हमेसा बुता तियारत समे निकल गे। 

तड़फ उठे भूँख मा किसनहा जुताई खातिर हे खेत जाना। 
नवा बहुरिया सम्हाले रँधनी त आगी बारत समे निकल गे। 

लगा के फाँसी भले लटकगे करत बचे के उदिम हजारों।
रहे उहाँ तेन दउड़ आवँय मगर उतारत समे निकलगे।

बहुत जरूरी रहय बताना मगर समे मा बता न पाए।
मिले सँवदिया दिलीप हकला खबर उचारत समे निकलगे।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

Sunday, 23 May 2021

गजल

गजल

2122  2122 2122 

तोर घर के रास्ता मँय पात नइ हँव। 
तेकरे सेती उहाँ मँय आत नइ हँव। 

फोन करके तँय बुलाये रोज मोला। 
का बतावँव काय खातिर जात नइ हँव। 

जब निकलथौं राह चंदा रोक लेथे। 
जल जबे कहिके गड़ी बतलात नइ हँव। 

एक टक देखत रथौं चकवा बरोबर।   
हाथ मा कौंरा मगर मँय खात नइ हँव।

मँय मया के मोह मा अइसे फँसे हँव। 
खात हँव मिरचा मगर सुसवात नइ हँव।  

मानथौं तँय हर तरह ले योग्य हावस। 
फिर भी मँय तोला सखी अपनात नइ हँव।

तोर होवत हे बिहा ये जान के भी। 
देख ले मोला तनिक पछतात नइ हँव। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

Thursday, 20 May 2021

मैं खुद स्वयं

मैं खुद स्वयं 

दुनिया को टोपी पहनाया, मैं खुद स्वयं बता दूँ। 
झूठ बोल राजा बन आया, मैं खुद स्वयं बता दूँ। 

लूटा मैने माल खजाना, लूटी दुनिया सारी। 
चोरों का सरदार कहाया, मैं खुद स्वयं बता दूँ।  

ठगना मेरा काम सदा है, कहता बातें सच्ची।
जो ना माने वही लुटाया, मैं खुद स्वयं बता दूँ।  

राह चलत राही भटका दूँ, मंजिल पहुँच न पाये। 
कितनों को जहनुम पहुँचाया, मैं खुद स्वयं बता दूँ।   

ठोंक ठाँक सब सीधा करता, जो मुझसे टकराये। 
अँकडू को झुकना सिखलाया, मैं खुद स्वयं बता दूँ।

सूरत मेरी भोली भाली, सीरत ना पहचाने।
इसी बात का लाभ उठाया, मैं खुद स्वयं बता दूँ।

फिर भी मेरी शान निराली, दुनिया मुझको पूजे। 
कोई मुझको जान न पाया, मैं खुद स्वयं बता दूँ। 

खादी वर्दी वाला हीरो, कहते मुझको सेवक। 
अपनी सेवा खुद करवाया, मैं खुद स्वयं बता दूँ। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार


Sunday, 9 May 2021

चौपई छंद


रेगिस्तान 

चट-चट जरत रथे जी पाँव। 
खोजे ले नइ पाबे छाँव। 
चारों डहर हवय जी रेत। 
जिहाँ मिलय नइ एक्को खेत। 

इहाँ ऊँट बस दउड़त जाय।
झट कुन मंजिल वो पहुँचाय। 
मनखे रेंगे जान गँवाय। 
पाँव धँसे ले चल नइ पाय।  

मिटे पेंड़ के नाम निशान। 
पानी इहाँ मिलय नइ जान। 
तभो लोग राहत हे मान। 
भेड़ी पालन मा दे ध्यान।

येला कहिथें रेगिस्तान। 
दिखथे जइसे हो शमसान। 
रेती बस हे चारों ओर। 
कतको देख दिखे नइ छोर।  

ये मनखे के करनी ताय। 
पेंड़ काट आफत ला लाय। 
रहिस इहों जंगल घनघोर। 
आज पेंड़ नइ बाँचे कोर। 

अब तो सबझन जावव चेत। 
धरती आज बनय झन रेत। 
लगे पेंड़ ला आज बचाव। 
जगा जगा मा पेंड़ लगाव। 
जय गंगान……..

दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार