Sunday, 30 May 2021

बाल कविता

साइकल कैंची फाँक

साइकल सीखत हे सोनू, 
सँग मा दउड़त हे मोनू। 

कैची फाँक फँसाये हे, 
हेंडिल सम्हल न पाये हे। 

हॉफ पायडिल मारत हे, 
झट ले पाँव उतारत हे। 

फिर खट ले चढ़ जावत हे, 
अड़बड़ मजा उड़ावत हे। 

जाने का मनवा जागिस, 
रेस चलाये बर लागिस।

गड्ढा पागे हकरस ले। 
सोनू गिर गे भकर ले।  

कुकुर 

मोर कुकुर के टेड़गा पूँछ।  
बबा ऐंठ राखे जस मूँछ। 

कतको सोज करँव नइ होय।  
काँय काँय रतिहा भर रोय।

भूँकत रहिथे वो दिन रात। 
निशदिन खावत रहिथें लात। 

कतको मार तभो नइ जाय। 
 जूठा पटरी चाँटय खाय।  

मोर कुकुर अब्बड़ हुशियार।
रतिहा जागय बन रखवार।  

वफादार मा अउवल ताय। 
मनखे तक ला धूल चटाय। 

इसकुल खुलगे आजा 

सुन रे सोनू सुन रे मोनू, 
इसकुल खुलगे आजा। 

कोरोना के काल सिरा गे, 
समाचार सुन ताजा। 

बिहना ले उठ कर ले झटपट, 
इसकुल के तैयारी। 

पुस्तक कॉपी कलम खोज तँय, 
झन जा ब्यारा बारी। 

नहा खोर के बासी खाले, 
बन जा भइया राजा। 

सुन रे सोनू सुन रे मोनू, 
इसकुल खुलगे आजा। 

गुड्डा गुड़िया छोड़ दुलौरी, 
अब तोला हे पढ़ना। 

निशदिन इसकुल आके बेटी, 
भाग अपन हे गढ़ना। 

बरतन धर के तरिया डबरी, 
माँजे बर अब ना जा। 

कोरोना के काल सिरागे, 
इसकुल खुलगे आजा।  

नावा चप्पल-दिलीप कुमार वर्मा

जरय भोंभरा चट चिट चइया।  
कइसे के जरही अब भइया।

मोर ददा सब दुख ला जाने।
नावा चप्पल ले के लाने। 

चट-चट चट-चट महूँ बजाहूँ। 
रेंगत जेन गली मा जाहूँ। 

धुर्रा माटी अब नइ होवय। 
काँटा खूंटी अब न गड़ोवय। 

गद्दी वाला चप्पल हावय। 
रंग चटक मोरो मन भावय। 

रोज-रोज येला मँय धोहूँ। 
मुरसरिया मा रख के सोहूँ। 

सयकिल दउड़-दिलीप कुमार वर्मा

सोनू मोनू सयकिल धर के। 
चन दिस हवय चलाये बर। 

दुन्नो झन तइयार खड़े हे। 
सरपट दउड़ लगाये बर। 

अंतस मन मा जोश भरे हे। 
सब ले अउवल आये बर। 

दउड़े लागिस सयकिल सरपट। 
ऊपर मा उड़ियाये बर। 

चलत-चलत गड्ढा हर आगे। 
भूले ब्रेक लगाये बर। 

सयकिल तक उड़िया के गिर गे। 
दुन्नो ला समझाये बर।  

बात समझ मा आगे सोनू
मोनू सीख चलाये बर।

जादा तेज चलाना होथे। 
हाथ पाँव तुड़वाये बर।

नावा कुरता 

नावा कुरता पहिरे सोनू। 
मुच-मुच-मुच मुस्कावत हे।

मुड़ी उठा के हीरो जइसे। 
खोर गली मा जावत हे।

जेला देखय बहुत लजावय। 
मुड़ी तहाँ गड़ियावत हे।

संगी साथी मन ले मिलके। 
सब झन ला दिखलावत हे।

नवा-नवा के मजा अलग हे।
एक तरफ तिरियावत हे। 

मइला जाही कुरता कहिके। 
खेले बर घबरावत हे।

गिनती

एक दो तीन चार। 
पढ़ना लिखना हावय सार। 

पाँच छय सात आठ। 
याद करव जी पूरा पाठ। 

नौ दस ग्यारा बारा। 
रहव नही कोनो बेचारा। 

तेरा चउदा पन्द्रा सोला। 
पढ़े लिखे सीखत हे भोला। 

सतरा अठरा उन्नीस बीस। 
पाठ सपाट सबो कर दीस। 

छन्न पकैया 

छन्न पकैया छन्न पकैया 
बबलू बंटी आवव। 
खेल-खेल मा का सीखे हव 
आके अभी बतावव। 

छन्न पकैया छन्न पकैया 
गिनती जोड़ घटाना। 
पढ़ना लिखना तको सिखेहन 
अँगरेजी बतियाना। 

छन्न पकैया छन्न पकैया 
सुग्घर करे पढ़ाई। 
होन हार लइका ला पा के 
मगन ददा अउ दाई। 

मुसुवा बने रखवार 

जोश-जोश मा मुसुवा इक दिन। 
बन बइठे सीमा रखवार। 

काँध रखे बंदूक पहुँच गे। 
जिहाँ बरफ के भारी मार। 

किट-किट किट-किट दाँत करे अउ। 
तन काँपे रुखुवा कस डार। 

बैरी ले टकराये पहिली। 
मुसुवा बपुरा माने हार। 

मुँह लटकाये वापिस आगे। 
ठंडा ला नइ पाइस झेल। 

सीमा के रखवारी करना। 
नोहय लइका मन के खेल। 

पुतरी के बिहा 

पुतरी बर लुगरा चल लाबो। 
बँह भर चूरी ला पहिराबो। 

पौडर टिकली माहुर काजर। 
ले के आबो आगर-आगर। 

करधन कंगन मुंदरी माला। 
नथली बिछिया पायल बाला। 

दुलहन कस पुतरी ल सजाबो।
पुतरा के सँग बिहा कराबो।  

बजही जम के गाजा बाजा। 
अब्बड़ मजा उड़ाबो आजा।

मोरो होही बिहा एक दिन। 
पर के घर मँय जाहूँ। 

बिना ददा दाई के संगी। 
मँय कइसे जी पाहूँ।  

चश्मा-दिलीप कुमार वर्मा 

बइठे रहिथे नाक मा
पकड़े रहिथे कान। 
चकचक ले उज्जर करे
बुढ़वा बर वरदान। 

घाम तको ला ढाँक दय
जइसे बदरी छाय। 
धुर्रा ला दुरिहा रखे
बहुत काम ये आय।  

हवा लगय नइ आँख मा
कीरा घुँस नइ पाय।  
टेढ़ा मेढ़ा रूप मा
चार चाँद लग जाय।

रंग-रंग के मिल जथे 
जेखर चश्मा नाम।  
ले लव हाट बजार मा 
सस्ता हावय दाम।

भोलू बंदर 

मँय बन जाहूँ भोलू बंदर। 
सब झन कइहीं मस्त कलंदर। 

रुखुवा मा चढ़ जाहूँ खट ले। 
आम टोर मँय खाहूँ फट ले। 

कूदत रइहूँ येती ओती। 
जाहूँ मँय मन करही जेती। 

बारी बखरी मा घुस जाहूँ। 
आनी बानी के फर खाहूँ। 

बरजे आही तब डरवाहूँ। 
खिसखिस कर के दाँत दिखाहूँ। 

लाठी धर कोनो जब आही। 
मोर पार कोनो नइ पाही।

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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