Sunday, 23 May 2021

गजल

गजल

2122  2122 2122 

तोर घर के रास्ता मँय पात नइ हँव। 
तेकरे सेती उहाँ मँय आत नइ हँव। 

फोन करके तँय बुलाये रोज मोला। 
का बतावँव काय खातिर जात नइ हँव। 

जब निकलथौं राह चंदा रोक लेथे। 
जल जबे कहिके गड़ी बतलात नइ हँव। 

एक टक देखत रथौं चकवा बरोबर।   
हाथ मा कौंरा मगर मँय खात नइ हँव।

मँय मया के मोह मा अइसे फँसे हँव। 
खात हँव मिरचा मगर सुसवात नइ हँव।  

मानथौं तँय हर तरह ले योग्य हावस। 
फिर भी मँय तोला सखी अपनात नइ हँव।

तोर होवत हे बिहा ये जान के भी। 
देख ले मोला तनिक पछतात नइ हँव। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

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