कुंडलियाँ
रसता मा कंक्रीट के, गिर गे बबा उतान।
गोटानी तक टूट गे, होगे मरे बिहान।
होगे मरे बिहान, बबा भारी खिसियावय।
आये कइसन राज, गली मा धार बहावय।
कहिथें होत विकास, देख हालत हे खसता।
बने रहिस वो गाँव, मुरुम के राहय रसता।1।
जाना हावय एक दिन, ये दुनिया ला छोड़।
हपट हपट तँय रात दिन, धन दौलत झन जोड़।
धन दौलत झन जोड़, काम थोरिक नइ आवय।
नइ जावय ये संग, नही ये जान बचावय।
जे दुनिया मा आय, सबो ला मिलथे खाना।
करबे काय बटोर, एक दिन जब हे जाना।2।
हपटत बन खपरा मरे, पाई-पाई जोड़।
टुरा उदाली मारथे, ददा गए सब छोड़।
ददा गये सब छोड़, सोग पीरा नइ जानय।
दारू मुर्गा रोज, कभू बरजे नइ मानय।
संगी मन जुरियाय, खाय जम्मो झन झपटत।
पाई पाई जोड़, ददा हर मरगे हपटत।3।
दुख हावय जस नौतपा, जिनगी झुलसत जाय।
करँव अगोरा रात दिन, सावन हर कब आय।
सावन हर कब आय, बुझा दय लगे अगन ला।
पानी अस बरसाय, बहा दय सबो तपन ला।
तन मन सब हरियाय, सुखे सुख मन भर पावय।
जिनगी ला झुलसाय, नौतपा कस दुख हावय।4।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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