Sunday, 9 May 2021

चौपई छंद


रेगिस्तान 

चट-चट जरत रथे जी पाँव। 
खोजे ले नइ पाबे छाँव। 
चारों डहर हवय जी रेत। 
जिहाँ मिलय नइ एक्को खेत। 

इहाँ ऊँट बस दउड़त जाय।
झट कुन मंजिल वो पहुँचाय। 
मनखे रेंगे जान गँवाय। 
पाँव धँसे ले चल नइ पाय।  

मिटे पेंड़ के नाम निशान। 
पानी इहाँ मिलय नइ जान। 
तभो लोग राहत हे मान। 
भेड़ी पालन मा दे ध्यान।

येला कहिथें रेगिस्तान। 
दिखथे जइसे हो शमसान। 
रेती बस हे चारों ओर। 
कतको देख दिखे नइ छोर।  

ये मनखे के करनी ताय। 
पेंड़ काट आफत ला लाय। 
रहिस इहों जंगल घनघोर। 
आज पेंड़ नइ बाँचे कोर। 

अब तो सबझन जावव चेत। 
धरती आज बनय झन रेत। 
लगे पेंड़ ला आज बचाव। 
जगा जगा मा पेंड़ लगाव। 
जय गंगान……..

दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

No comments:

Post a Comment