जल हरण घनाक्षरी
खटिया के चार खुरा, बिना पाटी के अधूरा,
गाँथबे नेवार कामा, कर ले विचार तँय।
कहूँ रखे चार पाटी, कतको रहे वो खाँटी,
बिना खुरा पाबे कहाँ, सोंच ले अधार तँय।
राख खुरा पाटी सँग, गाँथ ले नेवार तँग,
सुत फिर लात तान, रोज थक हार तँय।
सुख जिनगी म पाबे,गंगा रोज तें नहाबे,
नता रिसता ल जोंड़, जिनगी सँवार तँय।1।
मनहरण
थोथना उतार झन, रेंगे बर हार झन,
जेन रुक जावत हे, उही मरे जान ले।
कोन राह अपनाही, कोन तोर सँग जाही,
कोन हा छुडाही हाथ, बने पहिचान ले।
रददा ये सरल नहीं, तभो ये गरल नहीं,
काँटा खूंटी ले भरे हे, बात सच मान ले।
उही ह मंजिल पाथे, जेन म साहस आथे,
चलना हे चलना हे, बस इही ठान ले।2।
दर्पण देख देख,सूरत सँवार डरे,
अंग ला निखार डरे, मेंकब लगाई के।
झक मिक झक दिखे, लोग एक टक देखे,
मटक मटक चले, महफ़िल आई के।
मुच मुच मुस्काय, आँखी तक मटकाय,
तनिक न सरमाय, तन ला दिखाई के।
फेसन हे भरमार, मोला लगे अंधकार,
जग चौंधियाय दिए, बिजुरी गिराई के।3।
रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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