सवैया
गहरी-गहरी सब बात करैं उतरे गहरी अब कोन पढ़य।
घबरावत बात सुने गहरी उथली-उथली तब भाव गढ़य।
कतको लिखथें गिरिराज हिमालय कोन बता फुलगी म चढ़य।
उथली-उथली लिख राख सबे निपटा-निपटा अब राह बढ़य।
इतरावत हें मनखे जब फोकट के भर पेट मिले अन पानी।
अब काम करे नइ जावत हें घर मा बइठे करथें मनमानी।
उन घूमत खोर गली मिलथें बिन फोकट मारत जाय पुटानी।
ठलहा रहि रोज नशा करथें तन घूरत जाय नही पहिचानी।
घुघवा नित आवत हे घर मा नरियावत राहय बैठ अटारी।
सुन के डर लागत रात खनी दिख पाय नही रतिहा बिट कारी।
हमरो महतारिन जाग जवै अउ जोर लगा उन देवय गारी।
सुन के घुघवा उड़िया वय जी मूसुवा पकड़े खुसरे झट बारी।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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