Sunday, 30 May 2021

घनाक्षरी

घनाक्षरी 

जनम-जनम बर, बँधना बँधाये हवे, 
तोर-मोर गड़ी सुन, शुभ सुरुवात हे।
जिनगी के रसता म, काँटा खूँटी मिल जाथे, 
टारत-टारत चल, तभे मजा आत हे
उरभट रसता म, सम्हल-सम्हल चल,  
देख के हपट झन, अँधियारी रात हे।
सुख दुख जिनगी के, घाम छाँव कस होथे, 
आवत जावत रथे, डरे के का बात हे।

झरर-झरर झर, झरना ले पानी गिरे, 
सादा-सादा दूध कस, झर-झर आत हे।  
जंगल के बीच रहे, झरना तीरथ गढ़, 
दूर-दूर के लोगन,देखे बर जात हे।  
कोनो देखे ऊपर ले, कोनो नीचे देखे जाय, 
आनी बानी पोज दे के, फोटो खिंचवात हे। 
निरमल पानी पाय, देख-देख हरसाय, 
डुबक-डुबक के जी, कतको नहात हे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

No comments:

Post a Comment