घनाक्षरी
जनम-जनम बर, बँधना बँधाये हवे,
तोर-मोर गड़ी सुन, शुभ सुरुवात हे।
जिनगी के रसता म, काँटा खूँटी मिल जाथे,
टारत-टारत चल, तभे मजा आत हे
उरभट रसता म, सम्हल-सम्हल चल,
देख के हपट झन, अँधियारी रात हे।
सुख दुख जिनगी के, घाम छाँव कस होथे,
आवत जावत रथे, डरे के का बात हे।
झरर-झरर झर, झरना ले पानी गिरे,
सादा-सादा दूध कस, झर-झर आत हे।
जंगल के बीच रहे, झरना तीरथ गढ़,
दूर-दूर के लोगन,देखे बर जात हे।
कोनो देखे ऊपर ले, कोनो नीचे देखे जाय,
आनी बानी पोज दे के, फोटो खिंचवात हे।
निरमल पानी पाय, देख-देख हरसाय,
डुबक-डुबक के जी, कतको नहात हे।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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