Wednesday, 2 October 2019

सुखी सवैया


अरछी परछी कुरिया अँगना, अब छोंड़ गली कइसे मँय जावँव।
पुतरी पुतरा चुलहा चुकिया,सब छोंड़ सखी कइसे बिसरावँव।
तरिया डबरी नरवा नदिया,बखरी धनहा ल कहाँ अब पावँव।
ससुराल गए सब छूट जही,भगवान जनी कब मैं हर आवँव।

घर के भिथिया खिड़की खटिया,जठना कुरसी सब जानत हावय। 
कब कोन कहाँ कइसे रइही, कहना सब मोर ल मानत हावय।  
जब जेन कहौं घर आवत हे, सब मोर ददा धर लानत हावय।
नइ जावँ सखी घर छोड़ कभू,सब आहट ला पहिचानत हावय।

दिलीप कुमार वर्मा

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