अरछी परछी कुरिया अँगना, अब छोंड़ गली कइसे मँय जावँव।
पुतरी पुतरा चुलहा चुकिया,सब छोंड़ सखी कइसे बिसरावँव।
तरिया डबरी नरवा नदिया,बखरी धनहा ल कहाँ अब पावँव।
ससुराल गए सब छूट जही,भगवान जनी कब मैं हर आवँव।
घर के भिथिया खिड़की खटिया,जठना कुरसी सब जानत हावय।
कब कोन कहाँ कइसे रइही, कहना सब मोर ल मानत हावय।
जब जेन कहौं घर आवत हे, सब मोर ददा धर लानत हावय।
नइ जावँ सखी घर छोड़ कभू,सब आहट ला पहिचानत हावय।
दिलीप कुमार वर्मा
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