पूड़ी काबर फूल जथे
पूड़ी काबर फूल जथे माँ,
गरम तेल मा जा के।
अइसन का जादू कर देथस,
पूड़ी ला लहुटाके।
तावा रोटी तको फूलथे,
जब आगी मा जाथे।
अइसन का करथस तँय अम्मा,
भीतर काय हमाथे।
सुन रे लल्ला मुन्ना राजा,
येमा नइ हे जादू।
हवा भरत हे ये रोटी मा,
कइसे सुन तँय दादू।
बाहिर-बाहिर भाग सिंका के,
तनिक ठोस हो जाथे।
भीतर-भीतर भाप बने ते,
निकल कहाँ फिर पाथे।
तेज आँच जइसे ही पाथे,
फुग्गा जस बन जाथे।
इही भाप के कारण रोटी,
पूड़ी गजब सुहाथे।
शिशु गीत
लल्ला मुन्ना राजा आजा,
सुनले एक कहानी।
एक शहर मा राजा राहय,
एक शहर मा रानी।
रानी के चंदा जस सूरत,
सब के मन ला भावँय।
ओ रानी ले बिहा रचाए,
राजा मन सब आवँय।
रानी कोनो ला नइ भावय,
चुपचुप बइठे राहय।
ओ राजा के रसता देखय,
जेला ओहर चाहय।
इक दिन एक सहेली पूछिस,
कहाँ बसे हे राजा।
सन्देसा लिखदे पहुचाहूँ,
आही लेके बाजा।
रानी सन्देसा लिख भेजिस,
आइस हमर दुआरी।
तँय राजा अस ओ रानी के,
जावँव मँय बलिहारी।
मुन्ना राजा दूल्हा बनही,
चढ़ घोड़ी मा जाही।
चाँद सरीखे ओ रानी ला,
बिहा करा के लाही।
बिहा करादे
दाई बिहा करादे मोरो,
मँय इसकुल नइ जावँव।
पढ़े लिखे मा मन नइ लागय,
तोला काय बतावँव।
अँगरेजी के ए नइ जानवँ,
गणित लगत हे भारी।
करिया आखर भइस बरोबर,
हिंदी लगे तुतारी।
येखर ले मँय बनवँ किसनहा,
करहूँ खेती बारी।
दाई मोरो बिहा रचा दे,
ला दे एक सुवारी।
घर के काम सबो तँय करथस,
खेत तको तँय जाथस।
दिनभर बूता मा रगड़ाथस,
खाना तहीं बनाथस।
नवा बहुरिया घर मा आही,
तोरो हाथ बटाही।
दाई मोरो बिहा करादे,
काम सबो बनजाही।
नाती नतनिन घर मा आही,
तँय दादी बनजाबे।
सुरतावत तँय घर मा रहिबे,
लइका ला खेलाबे।
रतिहा बीते कहत कहानी,
लोरी तको सुनाबे।
दाई मोरो बिहा करादे,
मजा अबड़ तँय पाबे।
आजादी
आजादी कइसे पाये हन,
येला जानव तूमन आज।
पुरखा मन आजादी खातिर,
का-का करिन हवय जी काज।
अत्याचारी अँगरेजन मन,
बिन कारण अबड़े दय मार।
लूट खसोट करँय ओ भारी,
दिन-दिन बाढ़य अत्याचार।
पानी सर के ऊपर आगे,
अब तो मार सहे नइ जाय।
लोहा ले बर अँगरेजन से,
चुपके-चुपके जुगत लगाय।
फूल संग रोटी ला दे के,
सन्देसा सब ला भिजवाय।
लड़ना हे करलव तइयारी,
अँगरेजी शासन हिल जाय।
अट्ठारह सौ सन्तावन के,
युद्ध अभी तक सब ला याद।
जेन हला दिस अँगरेजन ला,
शासन ला करदिस बर्बाद।
जान गवाइन कतको पुरखा,
कतको गइन हवय जी जेल।
कतको मन के पता चलिस नइ,
भारी दुख सब लेइन झेल।
तब्भो हार कहाँ मानिन हे,
बार-बार जावँय टकराय।
कतको अँगरेजन ला मारँय,
कतको वीर गति ला पाय।
त्याग अउर बलिदान करिन हे,
तभे देश होइस आजाद।
ओ पुरखा मन के करनी ला,
आज करिन चल सबझन याद।
सुन लव रे लइका तुम सुनलव,
पुरखा मन ला झन बिसराव।
ये माटी मा हवय समाये,
ये माटी ला तिलक लगाव।
राखी
बिहनाले टिपटॉप गोलू तइयार हे।
जानत हे आज तो जी राखी के तिहार हे।
काली ओ बाजार जाके उपहार लाये हे।
कोनो झन देख पावय झोला म लुकाये हे।
दीदी ल चकित करे, बड़ा हुशियार हे।
आरती सजाये दीदी पीढ़वा मढ़ाय हे।
आजा भाई राखी बाँधु गोलू ल बलाय हे।
मेवा मिष्ठान राखे थारी म बहार हे।
कुमकुम गुलाल के टीका ल लगाय हे।
आरती उतार दीदी राखी पहिराय हे।
मुँह मीठा कर दीदी, देवत दुलार हे।
गोलू जे लुकाये राहय झटकुन लान दय।
दीदी हो चकित देखे, खुशी हर जान दय।
भाई बहिनी के मया अपरम पार हे।
राखी
सब के माथा टीका लग गे।
मोर माथ हे सुन्ना।
राखी सबके बँधे कलाई।
मोर हाथ हे उन्ना।
दाई दीदी ले मिलवादे।
कहाँ बसे मँय जाहूँ।
रसता जोहत होही दीदी,
जा राखी बँधवाहूँ।
दाई के कुछ समझ न आवय
कइसे करय बहाना।
दीदी नइ हे ये मुन्ना के,
गड़बड़ होय बताना।
तुरते जा के राखी लानिस,
सँग मा लाय मिठाई।
दीदी तोरो भेजे कहिके,
बाँधिस हवय कलाई।
दाई
गजब मयारू हावय दाई,
खई खजेना लाथे।
चना फुटेना लाडू लाथे,
जब बजार ओ जाथे।
बड़े बिहिनिया अँगरा रोटी,
मोला रोज खवाथे।
कभू बनाथे पतला रोटी,
दूध संग परसाथे।
कभू-कभू रोटी मा चीला,
मुठिया फरा बनाथे।
कभू खपूर्री रोटी पोथे,
खावत गजब सुहाथे।
खेल-खेल मा घाव लगे तब,
झटपट दवा कराथे।
गजब मयारू हावय दाई,
अब्बड़ मया लुटाथे।
कान्हा बनाहूँ
लल्ला मुन्ना राजा आजा,
कान्हा आज बनाहूँ।
पीयर-पीयर धोती सँग मा,
पिताम्बरी पहिराहूँ।
माथ लगाहूँ चंदन टीका,
फूल हार पहिराहूँ।
मोर मुकुट मुड़ मा पहिरा के,
कान्हा असन सजाहूँ।
कमर बँधाही लट करधनिया,
पाँव बँधे पैजनिया।
ठुमक-ठुमक अँगना मा चलबे,
देखय चुनिया मुनिया।
मुरली ला मुख मा धर रखके,
मोहक तान बजाबे।
गोप गुवालिन दउड़े आही,
सुग्घर रास रचाबे।
नटखट लल्ला मुन्ना राजा,
गाय चराये जाबे।
फोर गगरिया दही लूट तँय,
माखन चोर कहाबे।
कहूँ कन्हैया मँय हर होतेंव।
कहूँ कन्हैया मँय हर होतेंव।
मुरली मधुर बजातेंव।
गोपी मन ला रिझा रिझा के,
सुग्घर रास रचातेंव।
गाय चराये मधुबन जातेंव,
खेल सखा सँग पातेंव।
राधा-राधा कह मुरली ले,
गोपी मन ल चिढ़ातेंव।
ग्वाल बाल सँग चुपके-चुपके,
गोपी मन घर जातेंव।
गगरी फोर गपागप मँय तो,
माखन मिश्री खातेंव।
कदम पेंड़ मा चढ़ के मँय हर,
जमुना कूद नहातेंव।
कहूँ कन्हैया मँय हर होतेंव,
नाग नाथ दिखलातेंव।
तीजा जाहूँ
मामा के घर जाहूँ दाई।
रोटी पीठा खाहूँ दाई।
जइसन जोरा होवत तोरो।
तइसन जोरा करदे मोरो।
मामा सइकिल मा जब आही।
मोला डंडी मा बइठाही।
नावा लुगरा तोला देही।
फ्रॉक मोर बर मामा लेही।
तीजा के तिहार मनाबो।
फिर बाबू सँग घर आ जाबो।
जंगल मा मंगल
जंगल मा मंगल सब करबो,
कहिके करिन बिचार।
गणपति ला प्रस्थापित करके,
मानन सबो तिहार।
मूर्ति बहुत बनावन चाहे,
पर ओ बन नइ पाय।
हारे सबझन कोशिश करके,
काय करे अब जाय।
सभा बीच मा मुसुवा आके,
देइस एक उपाय।
हाथी ला फिर सजाधजा के,
देइन हे बइठाय।
खीरा केरा लाडू खाके,
हाथी खुश हो जाय।
मुसुवा तक हर उचक-उचक के,
लाडू ला धड़काय।
रतिहा बेरा धूम-धड़ाका,
अब्बड़ होइस शोर।
हाथी बपुरा हल्ला सुनके,
भारी होगे बोर।
मार चिंघाड़त हाथी राजा,
उठगे बड़ गुस्साय।
टोर फोर के बाना बिंदरा,
जंगल डहर भगाय।
पूजा करना ठीक हवय पर,
करथव काबर शोर।
हाथी जइसन गणपति तक हर,
होवत अब तो बोर।
कतका ऊपर
ऊपर कतका ऊपर होही।
कइसे पता लगावँव।
उग जय तन मा पाँख कहूँ ता।
उड़िया के मँय जावँव।
बादर के ऊपर अउ कतका।
चंदा राहत हावय।
सुरुज नरायण के दूरी ला।
मोला कोन बतावय।
कतका दूर चँदैनी हावय।
जुग-जुग जे मन करथें।
पता लगा के ये भी आवँव।
कइसे ये मन बरथें।
दिखत चँदैनी के ऊपर मा।
अउर भला का होही।
कइसे के मँय जावँव ऊपर।
सोंचय सोनू टोही।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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