चौपाई छंद गाँव
महिमा गाथे गाँव के,बसे शहर मा आय।
अइसन जुच्छा बात ला,कोन भला अपनाय।1।
सब रचना मा करय बड़ाई।गाँव सबो ले बढ़िया भाई।
गाँव डहर कोनो नइ जावय।सबो शहर कोती रतियावय।
नदिया नरवा के गुण गावय।पर चिखला कोनो नइ भावय।
माटी घर के करे बड़ाई।पर जम्मो पक्की अपनाई।
खेत खार तरिया ला गावय।पर बिच्छी ले बड़ घबरावय।
बर पीपर के छाँव बताथे।एक पेंड़ पर कोन लगाथे।
कंडिल के सब गाथा गाही।छितका कुरिया ला सहराही।
पर बिजली के देखे भागय।बिन बिजली रतिहा जे जागय।
गउ माता कागज मा मानय।गइया ला कोनो नइ जानय।
आज गाँव ले गाय भगा गे।घूमत हे लावारिस लागय।
खेती के महिमा सब गाथे।हरियर धान देख सहराथे।
पर कोनो करना नइ चाहय।गाँव छोंड़ शहरी बन राहय।
चिक्कन घर के आदी होगे।कोन भला चिखला ला भोगे।
खोर गली कंक्रीट लगे हे।साँप बिछी सब दूर भगे हे।
महू इही लाठी के मारे।गाँव छोंड़ के शहर पधारे।
पर सुरता बचपन के हावय।सोंच सोंच अंतस सुख पावय।
अब जाँगर कोनो नइ पेरह।भरे कुंड के पानी हेरय।
जाने कब तक ओ चल पाही।सबो घूम फिर वापिस आही।
गाँव निहारत हावय रसता।आही बाबू धर के बसता।
धरती के सब खान सिराही।खेत काम फिर सब के आही।
जेकर होवत हे उत्पादन।तेन काम मा हाथ बटावन।
धरती दाई ला सिरजावन।खान बंद कर पेंड़ लगावन।
खाये के सब चीज हा, खेत खार ले आय।
धरती भीतर जे मिले, कोन भला ओ खाय।2।
सुविधा दे दव गाँव मा, बिजली के भरपूर।
गाँव सरग बन जाय जी,छोंड़ न जावय दूर।3।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाजार
महिमा गाथे गाँव के,बसे शहर मा आय।
अइसन जुच्छा बात ला,कोन भला अपनाय।1।
सब रचना मा करय बड़ाई।गाँव सबो ले बढ़िया भाई।
गाँव डहर कोनो नइ जावय।सबो शहर कोती रतियावय।
नदिया नरवा के गुण गावय।पर चिखला कोनो नइ भावय।
माटी घर के करे बड़ाई।पर जम्मो पक्की अपनाई।
खेत खार तरिया ला गावय।पर बिच्छी ले बड़ घबरावय।
बर पीपर के छाँव बताथे।एक पेंड़ पर कोन लगाथे।
कंडिल के सब गाथा गाही।छितका कुरिया ला सहराही।
पर बिजली के देखे भागय।बिन बिजली रतिहा जे जागय।
गउ माता कागज मा मानय।गइया ला कोनो नइ जानय।
आज गाँव ले गाय भगा गे।घूमत हे लावारिस लागय।
खेती के महिमा सब गाथे।हरियर धान देख सहराथे।
पर कोनो करना नइ चाहय।गाँव छोंड़ शहरी बन राहय।
चिक्कन घर के आदी होगे।कोन भला चिखला ला भोगे।
खोर गली कंक्रीट लगे हे।साँप बिछी सब दूर भगे हे।
महू इही लाठी के मारे।गाँव छोंड़ के शहर पधारे।
पर सुरता बचपन के हावय।सोंच सोंच अंतस सुख पावय।
अब जाँगर कोनो नइ पेरह।भरे कुंड के पानी हेरय।
जाने कब तक ओ चल पाही।सबो घूम फिर वापिस आही।
गाँव निहारत हावय रसता।आही बाबू धर के बसता।
धरती के सब खान सिराही।खेत काम फिर सब के आही।
जेकर होवत हे उत्पादन।तेन काम मा हाथ बटावन।
धरती दाई ला सिरजावन।खान बंद कर पेंड़ लगावन।
खाये के सब चीज हा, खेत खार ले आय।
धरती भीतर जे मिले, कोन भला ओ खाय।2।
सुविधा दे दव गाँव मा, बिजली के भरपूर।
गाँव सरग बन जाय जी,छोंड़ न जावय दूर।3।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाजार
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