कुंडलियाँ
नकटा कुटहा मन सबो, बारी बारी आय।
हमला उल्लू जान के,काँव काँव चिल्लाय।
काँव काँव चिल्लाय,झूठ बोलत हे भारी।
समे परे तब आय,बतावय बड़ लाचारी।
सरम घलो नइ आय,रहे ये भारी जुठहा।
अवसर वादी जान ,रहे ये नकटा कुटहा।
कतको तँय दुतकार ले,नइ जावय ये दूर।
पाँव धरे बिनती करे,कर देथे मजबूर।
कर देथे मजबूर,हमर ले वादा लेथे।
कुटहा येला जान,कुकुर कस गर ला देथे।
ये नइ कभू अघाय,खाय बर दे तँय जतको।
सागर रहिथे पेट,भरे मिलजाही कतको।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
नकटा कुटहा मन सबो, बारी बारी आय।
हमला उल्लू जान के,काँव काँव चिल्लाय।
काँव काँव चिल्लाय,झूठ बोलत हे भारी।
समे परे तब आय,बतावय बड़ लाचारी।
सरम घलो नइ आय,रहे ये भारी जुठहा।
अवसर वादी जान ,रहे ये नकटा कुटहा।
कतको तँय दुतकार ले,नइ जावय ये दूर।
पाँव धरे बिनती करे,कर देथे मजबूर।
कर देथे मजबूर,हमर ले वादा लेथे।
कुटहा येला जान,कुकुर कस गर ला देथे।
ये नइ कभू अघाय,खाय बर दे तँय जतको।
सागर रहिथे पेट,भरे मिलजाही कतको।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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