खेल
जीवन का यह खेल,हमे कुछ समझ न आये।
जाने कैसे रंग,आज हमको दिखलाये।
धूप छाँव का मेल,चले नित शाम सवेरे।
जीवन के दिन चार,उसे भी दुख हैं घेरे।
खुशियों की रख चाह,सवेरे उठ जाते हैं।
दिनभर भागम भाग,शाम को घर आते हैं।
होते थक कर चूर,रात निद्रा में जाती।
ढूंढी खुशियाँ रोज,हाथ पर ये ना आती।
हमने जाना खेल,मौज मस्ती का होता।
मिलता है आनंद,यहाँ कोई ना रोता।
पर ये कैसा खेल,जहाँ सारे हैं खोते।
पूछो जिससे हाल, हाल पर सब हैं रोते ।
सुख दुख का यह खेल,हमे क्यों नाच नचाते।
क्या कोई है और,हाथ जिसके हैं खाते ?
पासा कोई फेंक,हमे है राह चलाता।
जीवन का यह भेद,किसी को समझ न आता।
खेल रहा है और, मोहरा केवल हम हैं।
फिर भी सुख की आश, बताओ ये क्या कम है।
जीवन के दिन चार, उसे भी खास बनाओ।
खेले कोई और,उसी में आनंद पाओ।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार 19-11-2019
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