Sunday, 18 October 2020

गीत(सार)

सार गीत

गुनगुन गुनगुन गुनगुन करके,सब ला गीत सुनाथे।
जेन सुने नइ बात उँखर ता,ओला मजा चखाथे।

सुनले गीत बने ओ गाथे,निसदिन संझा बेरा। 
रात रात भर जागत रहिथे, करे तोर घर डेरा।  
जबतक ताली तहूँ बजाबे,तबतक गाना गाही।
ताली करबे बंद तहाँ ले,हुदरे बर ओ आही।   
तब भी नइ जागे तँय हा ता,पेट भरे तन खाथे। 
गुनगुन गुनगुन 

कूलर के पानी मा घर हे,अउ डबरा के पानी ।
टायर डब्बा मा मिलजाथे, मनखे के नादानी।
जिहाँ जिहाँ पानी ठहरे हे, तिहाँ तिहाँ घर पाबे। 
जल्दी ये सब खाली करदे, नइ ते यमपुर जाबे।  
देथे ये हर बड़े बिमारी, तन हर तक थर्राथे। 
गुनगुन गुनगुन 

धरे बिमारी घूमत रहिथे,ये कोना ओ कोना।  
देह कँपा के अउ गरमा के,मलेरिया हे बोना। 
भले नानकन जीव हरे पर,मनखे ऊपर भारी। 
मार डरत हे ये मनखे ला,बन के अत्याचारी।  
मच्छर जेखर नाम हवय जी,खून पिये बर आथे।
गुनगुन गुनगुन  

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा

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