निश्छल छंद
रात रात भर जागत रहिथौं, करके आस।
तोर बिना हे मोरो जिनगी, निचट उदास।
घर बन बारी मोला अब तो, कुछ नइ भाय।
रसता जोहत रहिथौं हरपल, कब आ जाय।
का दिन अउ का रतिहा संगी, समझ न आय।
जोहत जोहत रसता तोरो, उमर पहाय।
जाने कोन घड़ी मा निकले, घर ला छोड़।
निच्चट हमला तँय बिसरा दे, मुख ला मोड़।
तोर बिना घर कुरिया सुन्ना, रसता बाट।
खेत खार नदिया अउ नरवा, तरिया घाट।
एक झलक बर साँस चलत हे, कहना मान।
तोला देखँव तब्भे जोही, छुटे परान।
दिलीप कुमार वर्मा
No comments:
Post a Comment