गजल
221 2122 221 2122
पुरखा बनाय रसता, सब ध्यान से चलव जी।
जइसन चले जमाना, तइसन अपन ढलव जी।
भाई ल लूट खाये,अब तँय बता का पाये।
ले झूठ के सहारा, अपनो ल झन छलव जी।
आये नवा जमाना, परिवेश हर बदल गे।
पहिरे ल देख के अब, झन हाथ ला मलव जी।
अँधियार हे गली हा, कब काय होय जाही
भटके दिखाव रसता,दिनरात तुम जलव जी।
अबड़े बुराई जग मा,देखे दिलीप रोवय।
पश्चिम ल छोंड़ देवव,अपने म तुम पलव जी।
दिलीप कुमार वर्मा
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