श्रृंगार छंद
जवानी के दिन होथे चार।
समे ला झन कर तँय बेकार।
बुढापा आ जाही फिर यार।
तहाँ ले हो जाबे लाचार।
समे के कर ले तँय उपयोग।
बढ़ा झन तन मा तँय हर रोग।
छोड़ दे दारू पीना यार।
देह ला कर देथे बेकार।
सोंच के कर ले तँय हर काम।
तहाँ फिर नइ होबे बदनाम।
बुढापा खातिर कुछ तो जोर।
नही ते कहलाबे तँय ढोर।
उठाले घर के तँय हर भार।
कभू झन कखरो ले तँय हार।
सदा जब रहिबे तँय हर ब्यस्त।
नशा तक हो जाही जी पस्त।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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