रूपमाला छंद
मोर सपना के सखी तँय, मोर मन के आस ।
मोर जिनगी हा चलत हे, तोर देहे साँस।
तोर ले हिरदे धड़कथे,तोर ले संसार।
तोर बिन सुन्ना परे हे, मोर घर अँधियार।
जे मया मँय तोर पाहूँ, हो जहूँ आबाद।
नइ मिले जे मोर जोही,हो जहूँ बरबाद।
तोर सुरता मा गुजरथे,मोर दिन अउ रात।
आ जबे तँय मोर मैना,कर मया बरसात।
तोर आँखी मा अँजाये,तेन कजरा ताँव।
तोर बेनी म सजाये ,तेन गजरा ताँव।
तोर माथा मा लगे मँय,रूप ला निखराँव।
तोर मुँह के लाल गोरी,दे मया बरसाँव।
दिलीप कुमार वर्मा
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