कुंडलियाँ
बरसा के पानी परे, महकावत हे अंग।
खेत खार झूमन लगे,धरती बदले रंग।
धरती बदले रंग, सरग कस भुइयाँ होगे।
मचलत चले किसान,तपन हर जम्मो खोगे।
होगे तनिक कुबेर,आय पर हे तरसा के।
जीव सबो हरसाय,पाय पानी बरसा के।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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