Sunday, 29 November 2020

छन्न पकइया

छन्न पकइया 

छन्न पकइया छन्न पकइया, जाड़ा के दिन आगे। 
सुर-सुर सुर-सुर हवा चलत हे, तन हर ठिठुरन लागे। 

छन्न पकइया छन्न पकइया, भुर्री बारव भाई। 
हाड़ा गोड़ा काँपत हावय, माते हे करलाई। 

छन्न पकइया छन्न पकइया, गरम रजाई लावव। 
ठिठुरत हावय बूढ़ी दाई, झट वोला ओढावव। 

छन्न पकइया छन्न पकइया, कम्बल तक कम लागे। 
कतको ओढव कथरी चद्दर, जाड़ कहाँ ले भागे। 

छन्न पकइया छन्नपकइया, छूहू झन जी पानी। 
बिहना बेरा कहूँ नहाये, सुरता आ जय नानी। 

छन्न पकइया छन्न पकइया, सूरज तक घबराथे। 
लेट लतीफी आवत हावय, अउ झट कुन बुड़ जाथे। 

छन्न पकइया छन्न पकइया, जाड़ा करे भलाई।
आनी बानी के तरकारी, मजा उड़ावव भाई। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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