लावणी छंद गीत
सरग बरोबर गाँव हवय गा, छोंड़ कभू झन जाबे रे।
देख शहर के चका चौंध मा,जाके झन फँस जाबे रे।
बड़े बड़े हे महल अटारी,उहाँ कहाँ तँय घर पाबे।
जम्मो उहाँ मकान बने हे, जेन गली मा तँय जाबे।
रहिथे सबो सराय बरोबर,देख तहूँ पछताबे रे।
पइसा खातिर सब दउड़त हे, समे कहाँ दे पावत हे।
जेन बिहानी ले जावत हे, रात अँधेरी आवत हे।
दया मया के बात करे ना,बता उहाँ का पाबे रे।
तरस जबे पानी के खातिर,हवा तको घर नइ आवय।
खेत खार देखे नइ पाबे,गन्दा नाला बोहावय।
शोर शराबा गली गली मा,सुन निसदिन झल्लाबे रे।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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