Friday, 11 December 2020

बाल कविता

बाल कविता 

कका कबूतर काकी कोयल। 
काँव-काँव काबर किकियाय। 
काँय-काँय कह का-का कहिके। 
कचर-कचर कर कान कटाय। 

काखर करथे कका कल्पना। 
काकी का-का कहिथे कान।
का-का कहिके कलह कराये। 
कोन बात मा मारय बान। 

कोन कराही सुलह कका के। 
कइसे करके करही काम। 
काकी का कुछ कहे कपसही।
कका करे कइसे आराम। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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