बाल कविता
कका कबूतर काकी कोयल।
काँव-काँव काबर किकियाय।
काँय-काँय कह का-का कहिके।
कचर-कचर कर कान कटाय।
काखर करथे कका कल्पना।
काकी का-का कहिथे कान।
का-का कहिके कलह कराये।
कोन बात मा मारय बान।
कोन कराही सुलह कका के।
कइसे करके करही काम।
काकी का कुछ कहे कपसही।
कका करे कइसे आराम।
रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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