Saturday, 5 December 2020

कविता

छोटे परिवार 

सुनले नोनी के बाबू,मन मा रख अब तँय काबू। 
छोटे से परिवार बसाबो,नइ लावन हम अउ बाबू। 

बेटी दू झन पूरा हे, इही हमर बर टूरा हे। 
बेटी बेटा एके होथे,झन तँय समझ अधूरा हे।  

घर मा सुख तब आही जी,उजियारा घर छाही जी। 
हाँसत कूदत जिनगी बीते,बेटी मन सुख पाही जी।

कमा कमा के लाबो जी,बेटी बने पढाबो जी। 
जइसन बेटी के मन चाही, तइसन लान दिखाबो जी।  

बेटी मन बढ़िया पढ़ही, आगू आगू ओ बढ़ही। 
नाम कमाही जग मा ओमन,भाग अपन सुग्घर गढही।  

जादा लइका दुखदाई,होथे अब्बड़ करलाई। 
पूर परे नइ कतको ला दे,लड़त रहे बहिनी भाई। 

कुरता तक नइ दे पाबो,खाना तक कइसे खाबो। 
रोज रोज हरहट कटकट ले,जल्दी हम मर तक जाबो। 

नोनी के बाबू सुनले,मन मा थोरिक तँय गुन ले। 
कइसन जीना हाबय तोला, रसता ला बढ़िया चुन लें। 

कामा तोर भलाई हे, संग ददा अउ दाई हे। 
कतका ला तँय पाले सकबे,दू लइका सँग बाई हे। 

छोटे जब परिवार रहे,तब सुख के आधार रहे। 
कहना मानव सबझन संगी,सच्ची बात दिलीप कहे। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा  
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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