बाल कविता
हवा
हवा चले जब सर-सर सर-सर।
पतंग उड़े तब फर-फर फर-फर।
पत्ता झरथें झर-झर झर-झर।
खार लगें फिर हर-हर हर-हर।
मार झकोरा जब ये आथें।
टीना टप्पड़ सब उड़ जाथें।
धूंध गरेरा धर के लाथें।
झाड़ झरोखा बड़ लहराथें।
कतको ये हर रार मचावँय।
हवा मिले सब जीवन पावँय।
रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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