मोर गली तँय झन आबे।आबे ता बड़ दुख पाबे।
मोर गली मा काँटा हे।चाब दिही बड़ चाँटा हे।
खटके सबके आँखी मा।वार करे सब पाँखी मा।
एक कदम नइ चल पाबे।देखे सब जेती जाबे।
ताना मार रुला देही।कहिके अबड़े सुख लेही।
आँसू पोछ न पाबे तैं।रो रो कहाँ बताबे तै।
बैरी अबड़ जमाना हे ।अबतक बहुत पुराना हे।
पहिनावा ला नइ भावै।अइसन तक मनखे हावै।
सँघरा कइसे चल पाबे।ताना सुन के पछताबे।
लुगरा बिन ये छोरी हे ।देखव निच्चट गोरी हे।
कइसन बहू कुवारी हे।लगथे शहरी नारी हे।
माँग तको सुन्ना हावै।हाथ धरे सँग सँग जावै।
लाज सरम सब छोड़े हे।कइसन नाता जोड़े हे।
मुड़ ढाँके तक नइ जानै।नता गुता ला नइ मानै।
जब ये सब ला सुन पाबे।तभे रहे बर तँय आबे।
तब तक बंद दुवारी हे।मोरो तो लाचारी हे।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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