Sunday, 7 July 2019

सखी छंद

ब्यथा कुकुर के

व्यथा कुकुर के सुन लौ जी।काय कहत हे गुन लौ जी।
काबर ओला दुख देथौ।नाम उखर काबर लेथौ।

मनखे ले गलती होथे।कुकुर बिचारा हा रोथे।
मनखे हर गारी खाथे।कुत्ता तब ओ कहलाथे।

अइसन का मजबूरी हे।कहना कुकुर जरूरी हे?
कुत्ता के का गलती हे।नाम डहर का चलती हे।

जादा जब गुस्सा जाथे।मनखे अब्बड़ चिल्लाथे।
खून पिये बर तक सोंचे।कुकुर सुने ता मुड़ नोंचे।

मनखे ला जइसे मारौ।गोंदा गोंदा कर डारौ।
खून हमर झन पीहौ जी।का अइसन तुम जीहौ जी।

हम तो करथन रखवाली।काम हमर नइ हे जाली। 
सेवा हमर कहानी हे।सँग तुहँरे जिनगानी हे।

मनखे जइसन झन जानौ।बात कहत हँव सच मानौ।
मनखे मन देथे धोखा।काम उखर नइ हे चोखा।

हम साथी अँधियारी के।खेत गली अउ बारी के।
का मनखे हर कर पाथे।ठुड़गा देखे डर्राथे।

अब तो कहना ला मानौ।काम हमर का हे जानौ।
नाम हमर झन लेहौ जी।अतके बस कर दैहौ जी।
दिलीप कुमार वर्मा

No comments:

Post a Comment