Monday, 10 August 2020

रोला छंद

रोला- दिलीप कुमार वर्मा 

राजा बेटा मोर, तोर सुरता आवत हे। 
चल दे तँय बनवास, मोर जिवरा जावत हे। 
कइसे दुख बीसराँव, समझ कुछ नइ आवत हे। 
तोर बिना घर द्वार, तनिक अब नइ भावत हे।  

लइकापन के तोर, खेल बड़ सुरता आवय। 
अँगना परछी खोर, तोर चलना बड़ भावय। 
चिखला रहच सनाय, ददा के कोरा जावच। 
नहलाये ल बलाँव, मोर तिर तँय नइ आवच। 

चल दे गुरुकुल छोंड़, पढ़े बर जोरे जोरा।
सुन्ना होगे फेर, ददा दाई के कोरा। 
आये बरसों बाद, लगिस घर खुशियाँ आगे। 
चल दे मुनि के संग, फेर अँधियारी छागे। 

बइठे करम ठठाँव, करँव का तहीं बता दे। 
कर ले सुग्घर बिहाव, बहू घर तँय हर ला दे। 
सच होइस हे ख्वाब, मगर अलहन हर आगे। 
चल दे तँय बनवास, मरे जस मोला लागे।  

अरे दुलरुवा मोर, राम तँय जल्दी आजा।  
सुन्ना हे घर बार, बनाबो तोला राजा।
आँखी हर पथराय, तोर रसता ला जोहत। 
भरत तको पछताय, राज ला बोहत बोहत।

कौशिल्या के हाल, राम ला कोन बतावय। 
रोवत हे दिन रात, सँदेसा कइसे जावय। 
मया बँधे हे तार, सदा लेगत लानत हे।
कइसन काखर हाल, दुनो झन सब जानत हे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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