Sunday, 30 August 2020

लावणी छंद

लावणी छंद 

कभू जवानी इहों रहिस हे, जिहाँ बुढापा छाये हे। 
कसे कसे सूरत मा अब तो, झुर्री अबड़ छबाये हे। 

करिया बादर रहिस मुड़ी मा, उहू तको पतराये हे। 
उत्तर दक्षिण अउ पश्चिम मा, घटा सबो तिरियाये हे। 

जतका करिया रहिस घटा सब, सादा होवत जावत हे। 
कतको मारँव पेंट तभो ले, जम्मो बाहिर आवत हे। 

साठ किलो के अस्सी होगे, लागत तन हे बड़ भारी। 
पेट बने लम्बोदर जइसे, लगे भयंकर बीमारी। 

चलना तक अब दूभर होगे, बइठे कुर्सी टोरत हँव। 
हाथ पाँव हाथी कस लागे, करम ठठा मुँड़ फोरत हँव। 

बीपी शूगर बाढ़त हावय, चलत साँस हर फूल जथे। 
श्वसन क्रिया तक लगे थकासी, कनिहा तक हर झूल जथे। 

ब्याम करव सब ला मँय कहिथौं, पर खुद से नइ हो पावय। 
कहाँ होय अनुलोम विलोम ह, बिहना उठना नइ भावय।

खाना पीना आधा होगे, तब ले तन नइ टोरत हे। 
बइठे ठलहा लम्बोदर कस, मुँह बस लाई फोरत हे। 

रचनाकार-- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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