Sunday, 9 August 2020

मुसुवा

मुसुवा 

मटर मटर मुसुवा हर करथे। 
देखत मोरो अंतस जरथे। 
दे मारँव डंडा कस लागे। 
पर मुसुवा हर खट ले भागे। 

घर मा आके उधम मचाथे। 
खाये के सब जिनिस ल खाथे। 
कपड़ा लगता कुतर डरत हे। 
घर भर मा ओ बिला करत हे। 

छोटे ले बड़का बड़ हावँय। 
खाये बर इहँचे सब आवँय। 
रतिहा बेरा किचकिच करथें। 
नींद हमर जम्मो वो हरथें। 

एक बार गुस्सा मा आके। 
पनही दे मारेंव उठाके। 
परगे ओ टीवी मा जाके। 
रोना आथे आज बता के।  

तब ले गुस्सा अंतस रखथौं। 
तहीं बता अउ का कर सकथौं। 
गणपति के वाहन अब मानँव। 
देव तुल्य मुसुवा ला जानँव। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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