दोहा
हाड़ मास ले तन बने, ईंटा गारा जान।
जइसे ढहे मकान हर, तइसे मरण समान।1।
का लेके आये रहे, जाबे का धर साथ।
धन दौलत इंहचे रहे, जाबे खाली हाथ।2।
पाँच तत्व के मेल ले, हो काया निर्माण।
अपन अपन मा लीन हो, उड़ जाथे जब प्राण।3।
मर के जाथे जीव सब, जेन जगा ले आय।
जइसे बरसे जल सबो, सागर मा मिल जाय।4।
आज उँखर बारी हवय, काली बारी मोर।
कोन अमर हावय इहाँ, परसों बारी तोर।5।
लइका ले बुढुवा सबो, जे दुनिया मा आय।
मरना तो निश्चित हवय, बारी बारी जाय।6।
मोर मरे ले कोन हर, रोही भला बताव।
सब स्वारथ के प्रेम ये, रोना रहे दिखाव।7।
बेटा रोथे बाप बर, कोन करे अब काम।
सब्बो जिम्मा मोर हे, नइ पाहूँ आराम।8।
जे दिन बेटा हर मरे, बाप जोर से रोय।
लाठी टूटे हाथ के, कहाँ गुजारा होय।9।
बाई दुनिया छोड़ के, चलदिस हे परलोक।
दूसर बाई लान लय, पति कब करथे शोक।10।
पति जब सरग सिधार लय, बाई करत विचार।
सबो सवाँगा छूट गय, बिरथा हे संसार।11।
जतके स्वारथ मा जुड़े, ततके ततके रोय।
बिन स्वारथ बिंदास हे, अंतस कुछ नइ होय।12
बुढ़वा बुढ़िया के मरे, कोनो हर नइ रोय।
बने करिस चलदिस कहे, धरती बोझा होय।13।
लइका जब मरजाय तब, बाप तको पगलाय।
सपना चकना चूर हो, रोवय करम ठठाय।14।
एक सखा अइसे रहे, बिन स्वारथ संताप।
लेन देन कुछ ना रहे, फिर भी करे विलाप।15।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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