Sunday, 9 August 2020

गजल


बहरे रजज़ मख़बून मरफ़ू मुखल्ला 
मुफ़ाईलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन मुफ़ाईलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन

1212 212 122 1212 212 122  

उहाँ अमीरी न हे गरीबी जिहाँ मया के बजार भाई। 
सजे सजाये सबो मिलत हे जिहाँ चले नइ उधार भाई।  

बिना लड़े जीत कइसे होही समर म आके अभी दिखावव। 
उही मजा ला चखे हमेसा भले मरे जीत हार भाई।

बड़ा बड़ौना बताये सब ला बड़ा मजा ले पनीर खाये। 
कहाँ दबाये ले ओ दबत हे सबो बतावय डकार भाई।

बड़ा अमीरी के रौब झाड़े खवाय तँय सब ला लेग होटल।
उधार बाँकी अभी तलक हे करे न वापस हमार भाई।

सबो सवाँगा भले करे तँय दिलीप बिंदी बिना अधूरा
कहाँ सुहाथे कढ़ी तको हर बता डले बिन लगार भाई 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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