मत्तगयन्द सवैया
हे गणराज सुनो बिनती मझधार फँसे हँव पार करो जी।
तोर बिना अब जीवन के रसता न दिखे उपचार करो जी।
मानत हौं दुख मा सुमिरौं सुख मोर हरे मत रार करो जी।
जीवन नाव हिलोरत हे अब थाम बने उपकार करो जी।
मदिरा सवैया
आवत हौ सुनथौं धरती तुम मूषक वाहन मा चढ़ के।
जोहत हे रसता सब तो घर तोर इहाँ बढ़िया गढ़ के।
हे गणराज दवा धर लानव काम करौ अपने बढ़ के।
देख बिमार हवे सब भक्त बने करदौ कुछ तो पढ़ के।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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