Saturday, 31 August 2019

गजल

गजल
221 1222 221 1222
मँय तोर मया खातिर,आगी ले गुजर जाहाँ।
धुतकार भले कतको,मँय तोर करा आहाँ।

मँय धीर धरइया हँव,जल्दी न हवय मोला।
भँवरा के सहीं रइहँव,तब तोर मया पाहाँ।

अवकात भले नइ हे, दू जून के रोटी के। 
पर तोर मया पाये,मँय चाँद तको लाहाँ।

खेती हे न बारी हे, घर हे न दुवारी हे।
पर तोर रहे खातिर,मँय ताज ल बनवाहाँ।

गदहा के असन बोली,सुर बांस बजे फटहा।
अरमान जगाये बर,मँय गीत तको गाहाँ।

बस हाड़ बचे हावय, पर जान बचे हावय।
मन तोर लुभाये बर,मँय मार तको खाहाँ।

मजनू न बनँव मँय हा, मँय हीर तको नो हँव।
कलजुग के मयारू हँव,मँय मार के मर जाहाँ।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

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