गजल
221 1222 221 1222
माटी के ये पुतला मन ,पथरा ल मनावत हे।
पूजा ल करे भारी,जाने का पावत हे।
भगवान कहाँ आही, बइमान हवय दुनिया।
जब काम परे तभ्भे,सुध देव के आवत हे।
गगरी म भरे पानी,कब तक ले बने रइही।
पर जाय उहाँ कीड़ा,जल जे न हटावत हे।
इनशान के दुनिया में,इनशान कहाँ मिलथे।
हैवान भरे जग मा,जन जन ल सतावत हे।
दुनिया म जे आये हे, ओ मर के रही इक दिन।
माया म फँसे जे हे, ओमन ह डरावत हे।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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