Saturday, 31 August 2019

घनाक्षरी

मनहरण घनाक्षरी - दिलीप कुमार वर्मा
तीजा तिहार
(1)
तीजा के तिहार आये, मन मोरो हरसाये,
भाई लेगे आही मोला, आँखी फरकत हे।
दाई ले मिलाप होही, खुसी मोरो बाप होही,  
छोटे बहिनी ल देखे, मन तरसत हे।
कब रतिहा पहाये, भाई मोरो घर आये,
मन तक अकुलाये, नींद न परत हे।
बेरा कहूँ होही भाई, जीव मोर छूट जाही,
जलदी से आजा लेगे,  जिवरा बरत हे।

(2)
सबो सँगवारी आही, पोरा धर भाँठा जाही,
आनी बानी बतियाही, भाई अब आव रे।
बेरा हा चढ़त हावे, मन हा ढरत हावे,
आँखी भर आये झन, सूरत दिखाव रे।
आशा मोरो टूटे झन, मन मोरो रूठे झन,
रसता निहारत हौं, झन खाना भाव रे।
बदला ते झन लेना, माफ मोला कर देना,
झगरा ओ बचपन, आज भूल जाव रे।

(3)
भाई भाई घर आगे, आँखी देख भर आगे,
खुशी के ये आँसु मोरो, रोके ना रुकत हे।
महूँ तीजा माने जाहूँ, सखी सँग मिल आहूँ,
सोंच सोंच हिरदे हा, देख सुसकत हे।
लागे मोरो पाँख जागे, भाई जब घर आगे,
मनवा अगास उड़े, दुनिया झुकत हे।
काम में न मन लागे, दुख सबो बिसरागे,
मन मा उमंग छागे, पाँव थिरकत हे।

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार (छत्तीसगढ़)

No comments:

Post a Comment