नवतप्पा- दिलीप कुमार वर्मा
चैपाई
सुरुज कका आँखी देखावय।
अँगरा जइसन ओ ललियावय।
धरती जरथे तावा जइसन।
दिन ये आये हावय कइसन।
रुख राई के पाना झरगे।
खेत खार सब परिया परगे।
कांदी कचरा मन ललियागे।
हवा चले ता दुरिहा भागे।
तरिया डबरी नदिया झिरिया।
पानी दर्शन नइ हे किरिया।
मरे मेचका मछरी माढ़े।
ठुड़गा रुखुवा देखत ठाढ़े।
हरर हरर बस हवा चलत हे।
उखरा रेंगत पाँव जलत हे।
जीव दिखे नइ चारो कोती।
जाने कइसन आय पनोती।
जीव जगत ला पानी चाही।
जाने बदरा कब बरसाही।
ये नवटप्पा आग लगाथे।
बिन पानी कतको मर जाथे।
घर मा खुसरे राहव भाई।
येमा सबके हवय भलाई।
झाँझ झकोरा लू ले बाँचव।
बरसा आही फिर सब नाचव।
नवतप्पा चर दिनिया होथे।
पर कतको जिनगी ला खोथे।
बात साँच ये कहना मानव।
बाँचे खातिर नुसखा जानव।
अपन सुरक्षा आप करव जी।
पानी पीयव प्याज धरव जी।
गमछा बांधव मुड़ मा भाई।
नइ ते हो जाही करलाई।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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