लावणी छंद- दिलिप कुमार वर्मा
बिरह गीत
जबले भौजी गाँव गये हे, भइया बड़ पछतावत हे।
संझा बिहना उसर पुसर के,कुकरी बकरा खावत हे।
ओखर गम मा डूबे रहिथे,दारू ला पीयय भारी।
आनी बानी बना बना के,पीरा खाना हे जारी।
संगी मन सकलाये रहिथे,ओखर पीरा बांटे बर।
करुहा करुहा दारू पी थे,अउ मछरी रस चांटे बर।
सब झन देवत रहे दिलासा,भौजी जल्दी आ जाही।
जुरमिल पीरा ला हर लेबो,दारू तको सिरा जाही।
भइया थोरिक धीरज धरलव,गम तोरो दुरिहा जाही।
गोवा घूमे चल गा जाथन,उहचे पीरा मिट पाही।
दुनिया गम मा रहे अकेला,बिरहा बन पछताथे जी।
जब ले भइया बिरहा होगे, निसदिन मौज उड़ाथे जी।
कहिथे दुनिया जब पीरा हे, तब तँय मौज उड़ा ले जी।
गम मा गम के छोडव गाना,सुख के गाना गाले जी।
सुरता करथे रात रात भर,जाने भौजी कब आही।
दारू मुर्गा अभी उड़ावय, जाने कब पीये पाही।
गाज गिरे भइया के छाती,अतका पीरा होवत हे।
गम ला झेले दारू पी के,झर झर आँसू रोवत हे।
भइया के दुख दूर करे बर, सब संगी मन आवव जी।
दारू मछरी कुकरी बकरा,अउ चखना धर लावव जी।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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