Wednesday, 17 June 2020

त्रिभंगी छंद

त्रिभंगी छंद- दिलीप कुमार वर्मा

बादर हर छागे, बरसा आगे, बने चलत हे पुरवाही। 
अब सुरुज लुकागे, गरमी भागे, रुख़राई सब हरसाही। 
बरसत हे पानी, परवा छानी, खेत खार सब हाँसत हे। 
बाजत हे बाजा, लउकय आजा, दादुर कूदत नाचत हे।  

धर चलय नँगरिहा, टुकना चरिहा, धान भरे ले जावत हे।
जोंतत हे नाँगर, पेरत जाँगर, छेड़ ददरिया गावत हे। 
बइला सँगवारी, खाय तुतारी, अपन भाग सहरावत हे।  
हे सखा किसनहा, बोवय धनहा,काँधा अपन मिलावत हे।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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