Saturday, 27 June 2020

रोला छंद

रोला छंद 

बबा कहे जे बात, आज जम्मो सच होगे। 
पुरखा मनके ज्ञान, कोन रद्दा मा खोगे। 
कहाँ सियानी गोठ, आज पाबे सँगवारी। 
लइका मनके राज, काज बिगड़े बड़ भारी। 

घर मा हवय सियान, रखाये मूरत जइसे। 
चलय नही कुछ बात, बता बोलय वो कइसे।  
देखत वो रह जाय, गजब आये लाचारी। 
बिगड़त हे घर द्वार, समस्या हावय भारी 

कतको देत निकाल, छोड़ आश्रम मा आवय।   
घर मा रहे सियान, आज कतको नइ भावय।
बबा कहावय कोन, आज लइका नइ जानय। 
ददा कहे जे बात, कहाँ लइका अब मानय।

अब नइ मिलय सियान, रहय जे पहिली घर घर। 
बिन गलती औलाद,काँप जावय तब थर थर। 
राखय सब ला बांध, पिरोये सुमता डोरी।  
भरे रहय परिवार, घरो घर कोरी कोरी। 

अब तो नइ हे आस, पुराना दिन ओ आही।  
नाती पंथी संग, बबा हर कब रह पाही। 
जतका हे परिवार, आज सब एकल होगे। 
टूटत हवय समाज, मनुज करनी ला भोगे।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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