Thursday, 26 September 2019

रोला

रोला

कर दे हे अँधियार,लगे बरसा हर आगे।
गरजत घुमड़त देख,बदरिया कारी छागे।
बरसत हे घनघोर, खेत भर पानी पानी।
आना जाना बंद,रुके हावय जिनगानी।

लगे सितम्बर मास,भरे दाई के कोरा।
दुर्गा दाई आय,करत हे सबो अगोरा।
पर आगे बरसात,योजना के का होही।
जेखर निकले धान,मुड़ी धर ओ हर रोही।

पानी पा हरसाय,किसनहा भाँठा वाला।
छेंकय मुहि के पार,कहय पानी झट पाला।
हो जाही अब धान,रहे नइ एक्को बदरा।
किरपा दाई तोर,धान सब जाही भदरा।

कइसे करहूँ काम, नौकरी वाला सोंचय।
सुख्खा मा बरसात,देख के मुड़ ला नोंचय।
रेन कोट ला लान,पहिर झट इसकुल जाहूँ।
जाड़ा की बरसात,जान ला महूँ बचाहूँ।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

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