Thursday, 26 September 2019

कविता

चूहा बिल्ली 

चूहा चूँ चूँ बोल रहा था।
कोठी को ओ खोल रहा था।
मेरी किस्मत झोल रहा था।
पक्के दाने फोल रहा था। 

बिल्ली हमने पाली एक। 
जिसमे खूबी भरीअनेक।
रातों को ओ करता चेक।
चूहा देखे करे अटेक।

पर चूहा था बड़ा चलाक।
चुपके से लेता था ताक। 
बड़ी तेज थी उसकी नाक।
बिल्ली देखे भगे तपाक। 

बिल्ली की अब बढ़ी आबादी।
पता नही कब हो ली शादी।
चूहों ने पाई आजादी।
अपने ऊपर आफत लादी।

बिल्ली चूहे ठेल रहे हैं।
माल हमारा झेल रहे हैं।
सुबे शाम ओ पेल रहे हैं।
चोर सिपाही खेल रहे हैं।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

No comments:

Post a Comment