Sunday, 24 May 2020

दुर्मिल सवैया

दुर्मिल सवैया- दिलीप कुमार वर्मा 

करिया कहिथे कतको करले धरती पर जीव कहाँ रह पाही।  
जिन लेवत जन्म धरा पर हे उन एक समे मर के घर जाही। 
चलते रहिथे यह चक्र सदा जिन जावत हे उन हा फिर आही।
बस एक उपाय करे तरथे जिन राम भजे नित राम ल गाही।  

कतको करले कतको भरले कुछ जाय नही सँग मा सँगवारी। 
सब लूट खसोट बटोर डरे धर हाथ दिखावत आज कटारी।  
घर रोवत आज ददा बइठे अउ द्वार खड़े दुखिया महतारी। 
अब तो रुक जा चुकता करदे धरती कर बाढ़त जेन उधारी।

गदहा मनके जब राज रही तब लात तको परसाद कहाही। 
हरियाय रही जब ये धरती नइ खाय सके सनसो म सुखाही। 
जब सूख जही धरती हर जी तब देख सफाचट खूब अघाही। 
लदकाय रही कतको पथरा परही फटकार त गीत सुनाही।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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