रूपमाला
मोर हिरदे मा खुसर गे तोर जब ले रूप। ठाढ़ बेरा मा तको मोला लगे नइ धूप। जाड़ मोला नइ जनावय पूस के ओ रात। आज कल मोला सुहावत हे घटा बरसात।
रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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