रूपमाला छंद- दिलीप कुमार वर्मा
मोर संगी मोर साथी मोर सुनले बात।
तोर बोली मोर मन ला देत हे आघात।
थोरकुन पागे मया मा बोल देते बोल।
मोर हिरदे के दुवारी आज देवँव खोल।
तँय रिसाये मोर ले हच होय का हे बात।
बोल बिगड़े हे तुँहर अउ बीच के हालात।
कोन भर दे कान हावय सच बता दे तोर।
आज देखे रूप तोरे मन डरत हे मोर।
तोर मन शंका हवय ता आज करले दूर।
बोल खुल के बात का हे झन रबे मजबूर।
मँय बताहूँ बात जम्मो जेन हावय साँच।
जानथौं मँय साँच हर नइ पाय संगी आँच।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
No comments:
Post a Comment