रोला छंद
लहुटत हे मजदूर, गाँव के सुरता आगे।
आये विपदा देख, शहर ले एती भागे।
बंद परे सब काम, रहे नइ ठउर ठिकाना।
लाँघन लइका देख, गाँव परगे जी आना।
जाये बर परदेश, सबो झन लउहा होवय।
परे समे के मार, गाँव आये बर रोवय।
होगे सब लाचार, आय बर रेंगत भाई।
छाला परगे पाँव, मातगे बड़ करलाई।
अपन गाँव ला छोड़, भला ये जाथे काबर।
आय समस्या दौड़, बता फिर आथें काबर।
इहाँ मिले जे काम, करे बर बड़ अटियाथे।
ज्यादा के रख आश, दउड़ सब बाहिर जाथे।
अब तो जावव चेत, कभू झन बाहिर जाहू।
खेत खार हे गाँव, उही मा खूब कमाहू।
रूखा सूखा जेन, मिले अब खा के राहव।
लालच मा फिर आय, कभू झन बाहिर जाहव।
दिलीप कुमार वर्मा
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