सार छंद- दिलीप कुमार वर्मा
करी घोषणा जब मुखिया ने, मेरा मन हर्षाया।
बंद रहोगे घर के अंदर, बात मुझे ये भाया।
काम नही करने जाना है, घर मे मौज उड़ाएँ।
खीर बतासे हलुवा पूड़ी, रोज बना कर खाएँ।
बहुत हो चुकी काम कमाई, भाग दौड़ थी भारी।
हुआ लॉक डाउन है भाई, अब अराम की बारी।
समय बिताया कुछ दिन हँस कर, अब तो है लाचारी।
घर के अंदर बंद हुए हैं, बोर हुए अब भारी।
सब्जी काटो रोज रोज फिर, पोछा रोज लगाओ।
अत्याचार करे हैं बाई, प्रभु जी हमे बचाओ।
इससे अच्छा ओ अच्छा था, सुबह काम से जाते।
मेल मिलाप सभी से करते, साँझ ढले घर आते।
अब तो अत्याचार हुआ है,बंधन जरा हटाओ।
खोल लॉक डाउन मुखिया जी, तरस जरा अब खाओ।
कोरोना की बात ठीक है, है भारी बीमारी।
पर हम मर जाएंगे घुटकर, समझो कुछ लाचारी।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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