गजल- दिलीप कुमार वर्मा
बहर 1222 1222 1222 1222
उदासी छाय हे सब मा, लगे जस हार होगे हे।
फँसे हावय सबो घर मा, लगे मझधार होगे हे।
बनावत हे बड़े पुलिया,रुके पर काम बरसों ले।
खटाई मा परे हे काम, पइसा पार होगे हे।
नशा छोंड़व कहे सब लोग, पर मानत कहाँ हावय।
बिहनिया ले चले दारू,घरो घर बार होगे हे।
रहे भाँठा बहुत हर गाँव, खेलन खेल हम संगी।
सबो ला घेर धनहा कस बना अब खार होगे हे।
कभू डंका बजय जग मा, कहावय सोन के चिड़िया।
हमर ये देश हा सिरतोन अब बीमार होगे हे।
न दाढ़ी मूँछ आये हे न टूटे दाँत बचपन के।
मुड़ी मा बांध के पगड़ी बड़ा सरदार होगे हे।
उमर कच्चा हवय नइ जान पावय का हरे दुनिया।
बिहाये बर करे जल्दी, का बेटी भार होगे हे।
बबा बइठे मुहाटी डोकरी दाई फुलाये मुँह।
मया के रंग छलके ले लगे तकरार होगे हे।
बने घर नाँव के जइसे, करोना हे महा सागर।
लगा के मास्क ला निकलव इही पतवार होगे हे।
सिपाही नर्स डॉक्टर अउ सफाई जे इहाँ करथे।
बचा के जान ये सब के, नवा अवतार होगे हे।
घरों घर आज मोबाइल हवे टी वी तको संगी।
सबो देखत रथे दिन रात,आँखी चार होगे हे।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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