गजल- दिलीप कुमार वर्मा
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कका के कहे बात भावय।
बबा के कहे याद आवय।
रहे जे पुराना जमाना।
उही के कथा सब सुनावय।
न झगरा न झंझट रहे जी।
सबो कोत सुमता बतावय।
रहे एक सब के घठौना।
जिहाँ शेर गइया नहावय।
चिरइया ह राहय दुवारी।
बिहनहा सबो ला जगावय।
सबो कोत जंगल कटाकट।
उहाँ जाय सबझन डरावय।
रहे साफ पानी नदी मा।
ससन भर सबो ला पियावय।
कहाँ आजकल ओ जमाना।
पुराना सबो हा नँदावय।
चले अब घरोघर म झगरा।
त भाई ल भाई ठठावय।
कका के कहाँ हे पुछारी।
ददा हर तको मार खावय।
न जंगल न झाड़ी इहाँ हे।
सबो आज चकचक कटावय।
दिलीपाज मा कर गुजारा।
पुराना भला कोन लावय।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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